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खेती की जमीन को बताया परिवार की रीढ़
बैठक में किसानों ने कहा कि उनकी कृषि भूमि वर्षों से परिवार की आजीविका का मुख्य साधन बनी हुई है। इसी जमीन से फसल उत्पादन कर परिवार का खर्च और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई सहित अन्य जरूरतें पूरी होती हैं। ऐसे में जमीन के अधिग्रहण से किसानों के सामने भविष्य में रोजगार और आर्थिक सुरक्षा का संकट पैदा हो सकता है।
किसानों का कहना था कि कृषि भूमि महज जमीन का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि उनके परिवार की आय, आजीविका और आने वाली पीढ़ियों का सहारा है। इसलिए किसी भी तरह के अधिग्रहण से पहले किसानों की वास्तविक समस्याओं और उनकी आपत्तियों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए।
उद्योग के लिए वैकल्पिक जमीन की मांग
बैठक में मौजूद किसानों और ग्रामीण जनप्रतिनिधियों ने कहा कि क्षेत्र में उद्योग लगने से रोजगार और विकास के अवसर जरूर बढ़ सकते हैं, लेकिन इसके लिए उपजाऊ कृषि भूमि का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने सरकार और जिला प्रशासन से औद्योगिक पार्क के लिए वैकल्पिक भूमि तलाशने की मांग की।
किसानों ने यह भी कहा कि प्रशासन को प्रभावित होने वाले ग्रामीणों के साथ खुली बातचीत करनी चाहिए और उनकी आपत्तियों व सुझावों को योजना में शामिल करने पर विचार करना चाहिए।
मांग नहीं मानी तो चरणबद्ध आंदोलन
बैठक में किसानों ने भूमि अधिग्रहण के खिलाफ सामूहिक रूप से आवाज बुलंद करने की रणनीति पर भी चर्चा की। किसानों ने कहा कि यदि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में चरणबद्ध तरीके से आंदोलन को व्यापक किया जाएगा। हालांकि, किसानों ने स्पष्ट किया कि अपनी मांगों को शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से सरकार तक पहुंचाया जाएगा। बैठक के अंत में किसानों ने आपसी एकजुटता बनाए रखने और अपनी कृषि भूमि की रक्षा के लिए सामूहिक संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया। बैठक में मुखिया राधेश्याम पाल, युगल किशोर उपाध्याय, रवि सिंह, रमेश सिंह, हनुमान चौबे, सुनील उपाध्याय, गुरुदेव उपाध्याय सहित बड़ी संख्या में किसान मौजूद रहे।