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हैरानी की बात यह रही कि जिस बीमारी के नाम पर क्लेम किया गया, उससे संबंधित मरीज का कोई पूर्व सर्जिकल इतिहास ही नहीं मिला। मेडिकल मानकों के अनुसार, चीरास्थल हर्निया आमतौर पर पहले हुए ऑपरेशन के बाद ही विकसित होता है। इसके अलावा, अस्पताल द्वारा प्रस्तुत अल्ट्रासाउंड और अन्य जांच रिपोर्ट भी जांच में फर्जी पाई गईं।
सिविल सर्जन की विस्तृत जांच रिपोर्ट के आधार पर बिहार स्वास्थ्य सुरक्षा समिति ने सख्त रुख अपनाते हुए अस्पताल को सस्पेंड कर दिया है और मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। स्वास्थ्य विभाग ने स्पष्ट किया है कि आयुष्मान भारत योजना में पारदर्शिता और मरीजों की सुरक्षा से किसी भी तरह का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यदि कोई अस्पताल नियमों का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो उसके खिलाफ इसी तरह की कड़ी कार्रवाई जारी रहेगी।