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कांग्रेस और बसपा की रणनीति को लेकर अब तक स्थिति साफ नहीं हुई है, वहीं एआईएमआईएम ने भी अपने पत्ते पूरी तरह नहीं खोले हैं। हालांकि इन दलों के बीच लगातार बातचीत का दौर जारी है और सभी की निगाहें अंतिम निर्णय पर टिकी हुई हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव में कांग्रेस की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि उसके पास छह वोट हैं जो चुनावी गणित को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन पार्टी की ओर से अब तक स्पष्ट रणनीति सामने नहीं आई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बिहार में कांग्रेस संगठनात्मक चुनौतियों से भी जूझ रही है। विधानसभा चुनाव के करीब चार महीने बीत जाने के बाद भी पार्टी ने अब तक विधायक दल का नेता तय नहीं किया है। ऐसे में यह पहला मौका होगा जब कांग्रेस बिना विधायक दल के नेता के ही राज्यसभा चुनाव में उतर रही है।
इसके अलावा पार्टी के भीतर विधायकों के टूट की चर्चाएं भी समय-समय पर सामने आती रही हैं, जिससे सियासी माहौल और भी गरमा गया है। ऐसे में यह राज्यसभा चुनाव सिर्फ संख्या बल का खेल नहीं रह गया है, बल्कि यह दलों की एकजुटता, रणनीति और राजनीतिक प्रबंधन की भी बड़ी परीक्षा बन गया है। अब सभी की निगाहें चुनाव परिणाम पर टिकी हैं, जो तय करेगा कि महागठबंधन सीमित संख्या बल के बावजूद सियासी समीकरण साधने में कितना सफल होता है।