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बिहार राज्यसभा चुनाव में बढ़ा सियासी रोमांच, पांच सीटों पर छह प्रत्याशी; सहयोगी दलों के वोट बनेंगे निर्णायक

बिहार राज्यसभा चुनाव: पांच सीटों पर छह उम्मीदवार, महागठबंधन की नजर कांग्रेस व छोटे दलों के वोट पर

Bihar: पटना, बिहार में सोमवार को होने वाला राज्यसभा चुनाव इस बार काफी दिलचस्प मोड़ ले चुका है। पांच सीटों के लिए कुल छह उम्मीदवार मैदान में हैं, जिससे मुकाबला और भी रोचक हो गया है। इनमें से पांच उम्मीदवार एनडीए खेमे से हैं, जबकि एक प्रत्याशी महागठबंधन की ओर से चुनाव लड़ रहा है। राजनीतिक समीकरणों के अनुसार महागठबंधन उम्मीदवार की जीत सहयोगी दलों के वोट पर काफी हद तक निर्भर मानी जा रही है। खासकर कांग्रेस, एआईएमआईएम, आईआईपी और बसपा के विधायकों की भूमिका इस चुनाव में अहम मानी जा रही है।

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NS Newsविधानसभा में राजद के पास 25 विधायक हैं। इसके अलावा कांग्रेस के छह, एआईएमआईएम के पांच, वामदलों के तीन, बसपा का एक और आईआईपी का एक विधायक है। इस आंकड़े के आधार पर देखा जाए तो महागठबंधन के लिए जीत की संभावना मजबूत मानी जा रही है, हालांकि सहयोगी दलों के अंतिम रुख को लेकर अभी पूरी तरह स्पष्टता नहीं है।
कांग्रेस और बसपा की रणनीति को लेकर अब तक स्थिति साफ नहीं हुई है, वहीं एआईएमआईएम ने भी अपने पत्ते पूरी तरह नहीं खोले हैं। हालांकि इन दलों के बीच लगातार बातचीत का दौर जारी है और सभी की निगाहें अंतिम निर्णय पर टिकी हुई हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव में कांग्रेस की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि उसके पास छह वोट हैं जो चुनावी गणित को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन पार्टी की ओर से अब तक स्पष्ट रणनीति सामने नहीं आई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बिहार में कांग्रेस संगठनात्मक चुनौतियों से भी जूझ रही है। विधानसभा चुनाव के करीब चार महीने बीत जाने के बाद भी पार्टी ने अब तक विधायक दल का नेता तय नहीं किया है। ऐसे में यह पहला मौका होगा जब कांग्रेस बिना विधायक दल के नेता के ही राज्यसभा चुनाव में उतर रही है।

इसके अलावा पार्टी के भीतर विधायकों के टूट की चर्चाएं भी समय-समय पर सामने आती रही हैं, जिससे सियासी माहौल और भी गरमा गया है। ऐसे में यह राज्यसभा चुनाव सिर्फ संख्या बल का खेल नहीं रह गया है, बल्कि यह दलों की एकजुटता, रणनीति और राजनीतिक प्रबंधन की भी बड़ी परीक्षा बन गया है। अब सभी की निगाहें चुनाव परिणाम पर टिकी हैं, जो तय करेगा कि महागठबंधन सीमित संख्या बल के बावजूद सियासी समीकरण साधने में कितना सफल होता है।

 

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