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प्राथमिकी दर्ज कराने वाले अधिकारी से भी पूछताछ
मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (स्थापना) शशि चंदन चौधरी ने ही शुरुआत में संविदा ऑपरेटर अविनाश राज समेत अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। अब जांच के क्रम में उनकी भूमिका से जुड़े बिंदुओं की भी पड़ताल की जा रही है। पुलिस यह स्पष्ट करना चाहती है कि सरकारी राशि के भुगतान की प्रक्रिया में किस स्तर पर अनुमोदन दिया गया और डिजिटल हस्ताक्षर का इस्तेमाल किस तरह हुआ। हालांकि, पूछताछ या जांच के दायरे में आने मात्र से किसी व्यक्ति की संलिप्तता साबित नहीं होती। मामले में संबंधित व्यक्तियों की भूमिका जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही स्पष्ट होगी।
फर्जी आईडी से भुगतान तक की प्रक्रिया की पड़ताल
जांच का केंद्र यह पता लगाना है कि कथित फर्जी शिक्षिका की आईडी किसने बनाई और उसका इस्तेमाल कर सरकारी राशि का भुगतान कैसे कराया गया। पुलिस भुगतान से संबंधित दस्तावेजों, डिजिटल हस्ताक्षर और अंतिम अनुमोदन की प्रक्रिया की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है। जांचकर्ता यह भी पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं कि भुगतान से पहले निर्धारित सत्यापन की प्रक्रिया अपनाई गई थी या नहीं। यदि प्रक्रिया में किसी स्तर पर अनियमितता हुई, तो उसकी प्रकृति और जिम्मेदार लोगों की पहचान करना भी जांच का हिस्सा होगा।
भुगतान प्रणाली की निगरानी पर उठे सवाल
करीब 98 लाख रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता ने शिक्षा विभाग की भुगतान प्रणाली और आंतरिक निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकारी भुगतान की प्रक्रिया में आईडी के सत्यापन से लेकर डिजिटल हस्ताक्षर और अंतिम मंजूरी तक कई स्तर शामिल होते हैं। ऐसे में जांच के दौरान यह स्पष्ट करना जरूरी होगा कि कथित अनियमितता किस स्तर पर हुई और संबंधित नियंत्रण व्यवस्था में कोई चूक थी या नहीं। फिलहाल पुलिस मामले से जुड़े तथ्यों और संबंधित लोगों की भूमिका की जांच कर रही है। जांच पूरी होने के बाद ही कथित घोटाले की वास्तविक स्थिति, भुगतान से संबंधित अनियमितताओं और जिम्मेदारी तय करने से जुड़े पहलुओं पर स्पष्ट जानकारी सामने आ सकेगी।