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जानकारी के अनुसार, शनिवार की शाम अनिता देवी अपने घर में रोटी बना रही थीं। इसी दौरान उन्हें जहरीले सर्प ने डस लिया। घटना के बाद परिजन उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाने के बजाय चैनपुर प्रखंड स्थित निमिया के सती माई धाम ले गए, जहां कई घंटों तक झाड़-फूंक कराई जाती रही। जब उनकी हालत लगातार बिगड़ने लगी, तब उन्हें भभुआ सदर अस्पताल लाया गया। अस्पताल में चिकित्सकों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया। मृतका के पिता धनंजय लोहार ने बताया कि सर्पदंश के बाद परिवार के लोग इलाज के लिए अस्पताल जाने की बजाय झाड़-फूंक कराने ले गए। जब कोई सुधार नहीं हुआ और तबीयत अधिक बिगड़ गई, तब अस्पताल लाया गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
ग्रामीण मंगरू बिंद ने बताया कि अनिता देवी के पति की दो वर्ष पहले ही मृत्यु हो चुकी थी। पति की मौत के बाद वह अपने चार बच्चों के साथ मायके में रह रही थीं। अब मां के निधन के बाद चारों बच्चे पूरी तरह अनाथ हो गए हैं। उन्होंने जिला प्रशासन से मांग की है कि सर्पदंश से हुई इस मौत को आपदा राहत के दायरे में शामिल करते हुए परिवार को मिलने वाली चार लाख रुपये की अनुग्रह सहायता राशि जल्द उपलब्ध कराई जाए, ताकि बच्चों के पालन-पोषण में मदद मिल सके। यह घटना एक बार फिर बताती है कि सर्पदंश जैसी आपात स्थिति में झाड़-फूंक या अंधविश्वास के भरोसे समय गंवाना जानलेवा साबित हो सकता है। स्वास्थ्य विभाग का स्पष्ट कहना है कि सर्पदंश का प्रभावी उपचार केवल अस्पताल में उपलब्ध एंटी-स्नेक वेनम (ASV) से ही संभव है। समय पर इलाज मिलने से अधिकांश मरीजों की जान बचाई जा सकती है। सरकार और स्वास्थ्य विभाग लगातार लोगों को जागरूक कर रहे हैं कि सर्पदंश होने पर मरीज को तुरंत नजदीकी सरकारी अस्पताल ले जाएं और किसी भी प्रकार के अंधविश्वास या झाड़-फूंक के चक्कर में न पड़ें। कैमूर की यह दर्दनाक घटना इस संदेश को और अधिक गंभीरता से लेने की जरूरत को उजागर करती है।



