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बिहार सरकार ने पहले ही नियम बना दिया है कि बिहार के नगर निकाय प्रमुख है यानी मेयर, डिप्टी मेयर और मुख्य पार्षद, उप मुख्य पार्षद डायरेक्ट जनता के वोटों से चुने जाएंगे अब तक मेयर पार्षदों के वोटों से चुने जाते थे उन्हें वार्ड पार्षदों के अविश्वास प्रस्ताव से हटाया जा सकता था अब जनता के वोट से चुने जाएंगे तो उन्हें पद से हटाने की नई व्यवस्था की गई है।
सरकार के नए विधेयक में शहरी निकायों में मेयर डिप्टी मेयर या मुख्य पार्षद उप मुख्य पार्षद के निर्वाचन के बदलाव की विस्तृत जानकारी दी गई है सरकार के नए कानून के तहत भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने पर, शारीरिक और मानसिक तौर पर अक्षम होने पर या 6 महीने से ज्यादा समय तक होने की स्थिति में मेयर या डिप्टी मेयर को सरकार पद से हटा सकती है यही नियम नगर परिषद और नगर पंचायतों के मुख्य पार्षद और उप मुख्य पार्षद पर भी लागू होगा।
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इसके साथ ही अगर वह लगातार तीन बैठकों में अनुपस्थित रहते हैं तो या अपने कर्तव्य का पालन करने से इनकार किया तो भी सरकारों ने हटा सकती है, सरकार ने इनके पद से हटाने की अनुशंसा करने के लिए लोक प्रहरी की नियुक्ति करने का फैसला किया है, लोक प्रहरी न्यायिक पद होगा नगर निकाय के प्रधान को हटाने का मामला लोक प्रहरी के पास जाएगा, लोक प्रहरी पूरे मामले को सुनवाई के बाद अगर उन्हें पद से हटाने की अनुशंसा करते हैं तो सरकार को यह आदेश पारित करना होगा।
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वहीं अगर नगर निकाय में मेयर, डिप्टी मेयर एवं मुख्य पार्षद, उप मुख्य पार्षद पद से हटा दिया जाएगा तो वे बाकी बचे कार्यकाल के दौरान फिर से निर्वाचन के योग्य नहीं होंगे यानि फिर से नहीं चुने जा सकेंगे, मेयर या डिप्टी मेयर की मृत्यु, पद त्याग, बर्खास्तगी और दूसरे कारणों से पद रिक्त होने पर फिर से चुनाव होगा, जनता के वोट से ही फिर से दोनों प्रतिनिधि चुने जाएंगे यह निर्वाचन पूर्व के डिप्टी मेयर के बचे हुए कार्यकाल तक ही रहेगा।
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अगर सशक्त स्थायी समिति के सदस्यों के पद में आकस्मिक रिक्ति होती है, तो मुख्य पार्षद या मेयर निर्वाचित पार्षदों में से किसी एक को नामित करेंगे, अगर कोई सशक्त समिति सदस्य त्यागपत्र देता है तो वह सात दिनों के बाद ही प्रभावी होगा।