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मांझी ने राज्यसभा की एक सीट पर अपनी मजबूत दावेदारी पेश करते हुए कहा कि उनकी पार्टी और उनका सामाजिक आधार एनडीए के लिए हमेशा निर्णायक रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि गठबंधन में रहते हुए उनकी भूमिका को बार-बार कमतर आंका गया और उनके साथ पहले भी न्याय नहीं हुआ। उन्होंने दो टूक कहा कि यदि आगे भी वही रवैया अपनाया गया, तो वे अलग राह चुनने में संकोच नहीं करेंगे। अपने बयान में उन्होंने दलित और महादलित समाज के प्रतिनिधित्व का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। मांझी का कहना था कि चुनावी जीत में उनके समर्थक वर्ग की बड़ी भूमिका रही है, इसलिए सत्ता और संसद में भी उन्हें उचित हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। उन्होंने इशारों में कहा कि केवल समर्थन लेकर बाद में नजरअंदाज करना सही नहीं है।
इतना ही नहीं, मांझी ने सांसद निधि को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि सांसदों को मिलने वाले फंड के उपयोग में कथित तौर पर कमीशन की चर्चा आम है और इसमें एक निश्चित प्रतिशत तक की हिस्सेदारी की बातें सामने आती रही हैं। हालांकि उन्होंने किसी व्यक्ति या संस्था का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके इस बयान से राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। मांझी के इन सख्त और खुले बयानों ने एनडीए के भीतर बेचैनी बढ़ा दी है। पहले भी वे समय-समय पर असंतोष जाहिर करते रहे हैं, लेकिन इस बार सार्वजनिक मंच से दी गई चेतावनी और स्पष्ट राजनीतिक मांगों ने आने वाले दिनों में गठबंधन की राजनीति को और गर्मा दिया है।



