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पीके की मुख्यमंत्री को चुनौती अपनी पसंद की एक पंचायत या गांव पैदल घूम कर दिखाएं

Bihar: चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की जनसुराज पदयात्रा के 95वें दिन पूर्वी चंपारण के चकिया प्रखंड के हरपुर गांव में प्रशांत किशोर ने मुख्यमंत्री को खुली चुनौती दी है और कहां की वह अपनी पसंद का एक भी पंचायत या गांव पैदल घूम कर दिखाएं, प्रशासनिक कार्यक्रम को यात्रा का नाम देना कहीं से उचित नहीं है समाधान यात्रा पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि एक कागज पर उनकी 14 यात्रा होगी सरकारी बंगले से निकलकर जिलों का दौरा करने कोई यात्रा नहीं कहा जा सकता।

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यात्रा का जनता से कोई सरोकार नहीं सिर्फ अधिकारियों एवं खास लोगों से मिलने को यात्रा बताया जाना हास्यास्पद नहीं है तो क्या है, नीतीश कुमार के शासन काल में अफसरशाही, भ्रष्टाचार व पीसी का दौर चल रहा है, इसे अधिकारियों का जंगलराज करने में कोई अतिशयोक्ति नहीं सरकार को लेकर जनता उदासीन है, मनरेगा सहित अन्य योजनाओं में राशि का 40 प्रतिशत तक पीसी कट जाता है, किसानों को समय से बीज व खाद उपलब्ध नहीं हो रहे यूरिया की कालाबाजारी एक मुख्य समस्या बनी हुई है खेतों में पहले नहर व नलकूपों से सिंचाई के लिए पानी मिलता था अब वह भी बंद हो गया है।

किसान सड़कों पर खाद बीज के लिए सर्द रातों में लाइन में खड़े होते हैं और सुबह होने पुलिस का डंडा मिलता है, सीमावर्ती क्षेत्रों में खाद की कालाबाजारी सरकारी तंत्र की विफलता का परिणाम है अपनी पदयात्रा का अनुभव साझा करते हुए पीके ने बिहार की बेरोजगारी और मजदूरों का दूसरे प्रदेशों में अधिकाधिक पलायन की विकरालता पर चिंता प्रकट करते हुए बताया कि पिछले तीस से चालीस वर्षों में यहां के नेताओं ने लोगों को पीढ़ी दर पीढ़ी मजदूर बनाने का काम किया है, यहां के परिश्रमी मजूदरों की मेहनत से अन्य प्रदेशों में उद्योग धंधे फल फूल रहे है।

बिहार में स्कूलों में खिचड़ी व कॉलेजों में सिर्फ डिग्री बाटी जा रही है शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो गया है केंद्र सरकार द्वारा संचालित मनरेगा प्रधानमंत्री आवास योजना स्वच्छ भारत मिशन राज्य की योजनाओं में नल जल योजना, नल जल व पक्की गली नाली की जमीन पर कार्यरूप को लेकर चर्चा की गई, किसानों को जानकारी देते हुए बताया कि पंजाब व हरियाणा के 70 प्रतिशत धान ,गेंहू व अन्य फसल सरकारी समर्थन मूल्य पर बेचा जाता है जबकि बिहार में पिछले दस वर्षों में सिर्फ 13 प्रतिशत धान व मात्र 1 प्रतिशत गेहूँ ही समर्थन मूल्य पर खरीदा गया है, जिससे बिहार के किसानों को 25 हजार करोड़ का नुकसान हुआ है, इसी प्रकार मनरेगा में बिहार सरकार केंद्र से 12 हजार करोड़ की राशि ले सकती है लेकिन प्रदेश सरकार द्वारा सिर्फ 4 हजार करोड़ ही लिया गया, बिहार में मजदूरों की बहुतायत संख्या होते हुए भी मनरेगा में मजदूरी नहीं मिलना दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।

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